पागल

​पागलों की तरह मैं उसका जो हो बैठा बाज आऊँ तो कैसे, कुछ तो मुझे बता - शेख महंमदशरिफ ई. 

इश्क के सैलाब में

​इश्क के सैलाब में हम, कंकर से डूब गये दुनिया के घोसले में हम, जिंदा ही मर गये लाश मेरी अब भी, होगी वहीं कहीं उभरने की कोशिश में जो, बिखर बिखर गये - शेख महंमदशरिफ ई. 

मेरी नहीं

​कुछ हकीकत भी है तू ऐ जिंदगी हसीन ग़म तो बस्स इतना के, वो हकीकत मेरी नहीं। - शेख महंमदशरिफ ई.

बचे नहीं

​हम नहीं हैं जिंदा अपने आप में भी वो जिंदा हैं पर वो तो जिंदा दिल नहीं हम ने उनकी चाहत में खुद को खो दिया वो खुद की चाहत में खुद ही बचे नही - शेख महंमदशरिफ ई.

इश्क फ़रेब

​इश्क फ़रेब, फ़रेब इश्क, और क्या बताएँ चाँद के दूजे नगमे की, हकीकत किसे दिखाएँ? इश्क की आबादी में, बर्बाद हुए जो हम दर्द की वसीयत में, सुकून कहाँ हम लिखवाएँ? घाव भी भरे नहीं, दिल के जख्म पर मौत के पहले मौत हुई, उसे किसे दिखलाएँ? जन्नत की सरगोशी में, जहन्नुम बसा हुआ जहन्नुम... Continue Reading →

निकला तो है

​निकला तो है सूरज, तो क्यूँ पहुंची नहीं है लव क्या मेरे ग़म के अंधेरे ने, उस को भी निगल लिया? - शेख महंमदशरिफ ई.

शोले

​ शोले जो बचे हैं, उन्हे भी खाक होने दो बची हुई राख ही, हवाओं में उड़ती है जब वक्त होता है,सब भाग लेते हैं जब बचता नहीं कुछ, तारीफें खिलती हैं - शेख महंमदशरिफ ई.

जी न सका

​जी नही सका वो जिंदगी हसीन तो है बहुत अब उसे मैं किताबों में छुपा रखता हूँ - शेख महंमदशरिफ ई.

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